पारंपरिक अवधि: 17,28,000 मानव वर्ष · युग अनुपात: 4 · धर्म-रूपक: धर्म के चारों पाद
सत्य युग को कृत युग भी कहा जाता है। अनेक पुराणिक वर्णनों में इसे वह अवस्था माना गया है जहाँ सत्य, तप, करुणा और धर्म अपनी पूर्ण शक्ति में उपस्थित हैं। धर्म को चार पादों पर स्थिर रूपक से समझाया जाता है।
इस युग की पारंपरिक अवधि 17,28,000 मानव वर्ष बताई जाती है। यह धार्मिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान का हिस्सा है, आधुनिक पुरातात्त्विक या वैज्ञानिक काल-गणना नहीं।
सत्य युग की कथाएँ पाठक को यह पूछने का अवसर देती हैं कि आदर्श नैतिक जीवन किन गुणों पर टिका है और वे गुण कठिन परिस्थितियों में कैसे बनाए जाते हैं।
इन अवधियों को धार्मिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान के रूप में पढ़ें, आधुनिक वैज्ञानिक काल-गणना के रूप में नहीं।