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व्रत · सम्पूर्ण भारत

श्रावण पुत्रदा एकादशी

एकादशी वैष्णव परंपरा का नियमित उपवास और स्मरण-दिवस है। वर्ष में सामान्यतः 24 एकादशियाँ आती हैं; अधिक मास या परंपरा के अनुसार संख्या/नाम में अतिरिक्त भेद हो सकते हैं।

यह व्रत या पर्व क्या है?

एकादशी वैष्णव परंपरा का नियमित उपवास और स्मरण-दिवस है। वर्ष में सामान्यतः 24 एकादशियाँ आती हैं; अधिक मास या परंपरा के अनुसार संख्या/नाम में अतिरिक्त भेद हो सकते हैं।

शुरुआत और परंपरा

एकादशी की परंपरा पुराणों और वैष्णव व्रत-साहित्य में अनेक कथाओं के साथ विकसित हुई। अलग एकादशी के साथ अलग कथा और फलश्रुति जुड़ी मिलती है।

कथा

राजा महीजित की लोकप्रिय कथा संतान-कामना से जुड़ी है; आधुनिक पाठक इसे परिवार की मंगल-कामना की सांस्कृतिक कथा के रूप में पढ़ सकते हैं।

भाव और महत्व

इंद्रिय-संयम, नियमित उपासना, दान, सरल भोजन और मन को विष्णु-स्मरण में लगाने की परंपरा।

घर में सरल विधि

सुबह स्नान और स्वच्छता के बाद शांत मन से संकल्प लें। पूजा-स्थान को सरल रखें और श्रीविष्णु/नारायण का स्मरण करें। दीप, जल और उपलब्ध पुष्प/फल अर्पित किए जा सकते हैं। दिनभर व्रत अपनी स्वास्थ्य-स्थिति और पारिवारिक परंपरा के अनुसार रखें। संध्या में कथा या संबंधित स्तोत्र पढ़ें, आरती/प्रार्थना करें और अंत में परिवार तथा सबके मंगल की कामना करें। किसी विशेष सामग्री को अनिवार्य मानने की आवश्यकता नहीं; श्रद्धा, संयम और स्वच्छ आचरण मुख्य हैं।

व्रत, भोजन और पारण

कई परिवार दशमी से सात्त्विक आहार रखते हैं और एकादशी पर अन्न त्यागते हैं। निर्जल/कठोर व्रत सबके लिए उचित नहीं; स्वास्थ्य की जरूरत प्राथमिक है। पारण द्वादशी में परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार किया जाता है।

स्वास्थ्य संबंधी स्थिति, गर्भावस्था, आयु, दवाइयों या चिकित्सकीय आवश्यकता में कठोर उपवास न करें। भक्ति को शरीर को नुकसान पहुँचाने की परीक्षा न बनाएं।

मंत्र / पाठ

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

क्षेत्रीय अंतर

स्मार्त और वैष्णव परंपराओं में कभी-कभी उपवास-दिन अलग हो सकता है। दिल्ली/NCR के लिए नीचे दिए दिन स्थानीय पंचांग-स्रोत पर आधारित हैं।

तिथि-स्रोत देखें →