यह व्रत या पर्व क्या है?
राजस्थान का प्रमुख गौरी-ईसर उत्सव, दाम्पत्य, सौभाग्य और वसंत से जुड़ा।
शुरुआत और परंपरा
गौरी और ईसर/शिव के लोक रूपों की पूजा, गीत और शोभायात्राएँ इसकी पहचान हैं।
कथा
गौरी की तपस्या और शिव के साथ विवाह की कथाएँ लोकगीतों में अनेक रूपों से आती हैं।
भाव और महत्व
संबंधों में सम्मान, उत्सव और स्त्री-केंद्रित लोकसंस्कृति।
घर में सरल विधि
सुबह स्नान और स्वच्छता के बाद शांत मन से संकल्प लें। पूजा-स्थान को सरल रखें और देवी का स्मरण करें। दीप, जल और उपलब्ध पुष्प/फल अर्पित किए जा सकते हैं। दिनभर व्रत अपनी स्वास्थ्य-स्थिति और पारिवारिक परंपरा के अनुसार रखें। संध्या में कथा या संबंधित स्तोत्र पढ़ें, आरती/प्रार्थना करें और अंत में परिवार तथा सबके मंगल की कामना करें। किसी विशेष सामग्री को अनिवार्य मानने की आवश्यकता नहीं; श्रद्धा, संयम और स्वच्छ आचरण मुख्य हैं।
व्रत, भोजन और पारण
उपवास/पूजा परिवार पर निर्भर।
स्वास्थ्य संबंधी स्थिति, गर्भावस्था, आयु, दवाइयों या चिकित्सकीय आवश्यकता में कठोर उपवास न करें। भक्ति को शरीर को नुकसान पहुँचाने की परीक्षा न बनाएं।
मंत्र / पाठ
गौरी-शंकर स्मरण।
क्षेत्रीय अंतर
राजस्थान में विस्तृत, कुछ परंपराएँ MP/Gujarat में भी।