यह व्रत या पर्व क्या है?
गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति।
शुरुआत और परंपरा
भगीरथ की तपस्या और गंगा अवतरण का प्रसिद्ध पुराणिक प्रसंग इसका आधार है।
कथा
राजा भगीरथ के पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने की कथा धैर्य और दीर्घ प्रयास का प्रतीक है।
भाव और महत्व
जल के प्रति सम्मान, दान और स्वच्छता।
घर में सरल विधि
सुबह स्नान और स्वच्छता के बाद शांत मन से संकल्प लें। पूजा-स्थान को सरल रखें और माँ गंगा का स्मरण करें। दीप, जल और उपलब्ध पुष्प/फल अर्पित किए जा सकते हैं। दिनभर व्रत अपनी स्वास्थ्य-स्थिति और पारिवारिक परंपरा के अनुसार रखें। संध्या में कथा या संबंधित स्तोत्र पढ़ें, आरती/प्रार्थना करें और अंत में परिवार तथा सबके मंगल की कामना करें। किसी विशेष सामग्री को अनिवार्य मानने की आवश्यकता नहीं; श्रद्धा, संयम और स्वच्छ आचरण मुख्य हैं।
व्रत, भोजन और पारण
उपवास स्थानीय परंपरा से।
स्वास्थ्य संबंधी स्थिति, गर्भावस्था, आयु, दवाइयों या चिकित्सकीय आवश्यकता में कठोर उपवास न करें। भक्ति को शरीर को नुकसान पहुँचाने की परीक्षा न बनाएं।
मंत्र / पाठ
ॐ गंगायै नमः।
क्षेत्रीय अंतर
हरिद्वार/ऋषिकेश/वाराणसी में स्नान-परंपरा प्रमुख; जल-सुरक्षा और प्रदूषण से बचना आवश्यक।